इतना हुआ तबाह कोई डर नहीं रहा
लगता है रहनुमा दुआ भी कर नहीं रहा
हर कूचा-ए-जहान में तो मर रहे हैं सब
दिल में मिरे है कोई जो अब मर नहीं रहा
चूमूँ किसी को कैसे मिरे ज़ेहन में हो तुम
इस का मगर मलाल तो अक्सर नहीं रहा
मैं रो रहा था हुस्न न तेज़ाब हो ख़ुदा
वो फूल बन गया तो मैं ख़ंजर नहीं रहा
आए कई बहार के मौसम चले गए
ये दर्द का दरख़्त मिरा झर नहीं रहा
वो ग़ैर थे के कोई भी आँसू नहीं मिला
तू तो हमारी चीख भी सुन कर नहीं रहा
तुम को बनाया देवता तुम कूच कर गए
फिर राह में ख़ुदा का कहीं घर नहीं रहा
तुम पर है सल्तनत रखो ज़ंजीर हाथ में
मैं भी तो हूँ कबीर सो झुककर नहीं रहा
हम कौन जी रहे हैं ये एहसास ज़िंदगी
कुछ भी नहीं जहान में तू गर नहीं रहा
सब ख़ूब गा रहे सर-ए-महफ़िल मिरी ग़ज़ल
आँखों में कोई दर्द का मंज़र नहीं रहा















