कौन दुनिया मेरे हिस्से में ख़ुदा रक्खी है
एक ख़्वाहिश में ये संदूक बचा रक्खी है
एक लड़की मेरे कमरे को सजा रखती थी
आज दीवार पे तस्वीर सजा रक्खी है
ये शराबों का नशा हम से न होगा साक़ी
हो न तौहीन तो लग़्ज़िश ही चढ़ा रक्खी है
आख़िरी वक़्त है तू है प अलामत अपनी
तेरे होते हुए सीने से लगा रक्खी है
अब सलीमों से करें कैसे वफ़ा का शिकवा
वो न ज़िंदा है मिरी जान चुना रक्खी है
एक लड़की कई मुद्दत से है चाहे मुझ को
वरना काफ़िर के कहाँ हक़ में दुआ रक्खी है
है अलम इतना कि घुट घुट के जिया करते हैं
एक मुस्कान ने सब मर्ज़ दबा रक्खी है
हम न कहते थे के एहसास बचा लो गुलशन
है ये अंजाम कि बोतल में हवा रक्खी है















