ये तरक़्क़ी नदी ताज़गी खा गई
द्वारिका कृष्ण की बाँसुरी खा गई
जैसे बाबा निगलते रहे भूख को
जैसे बेटों को ये नौकरी खा गई
एक मुद्दत हुई तुम को चूमा नहीं
कितनी सिगरेट तो ये तिश्नगी खा गई
इक शहंशाह के बेटे को गद्दी मिली
इक शरीफ़ उन निसा तीरगी खा गई
तुम को रस्सी ने पंखे ने तड़पा दिया
और हम को भी ये कोठरी खा गयीउ
इक मुसव्विर ने तुम को बनाया ख़ुदा
फिर ख़ुदा को मिरी बंदगी खा गई
लापता हो गए सब पतंगे यहाँ
कितने जुगनू तो ये रौशनी खा गई
कितना रोते हो तुम यार लड़की हो क्या
कितने लड़कों को ये बानगी खा गई
महफ़िल-ए-नूर थी दौलत-ए-इश्क नइं
इक तवाएफ़ को ये पेशगी खा गई
— Nirmal Ehsaas















