शब-ए-तन्हाई पहले ख़ुद को जलाना है मुझे
फिर अपनी राख़ भी ख़ुद ही को बहाना है मुझे
जो चीख़ती है मुझ में तेज़ कोई ख़ामोशी
अब उस से तेज़ कोई शोर मचाना है मुझे
तुझे बना के पहले मेरी तरफ़ आता हुआ
फिर उस के बा'द उसी तस्वीर में जाना है मुझे
कुरेद कर के इसे रोज़...नया रक्खा है
जो दिख रहा है नया घाव पुराना है मुझे
उतारना है के अव्वल तो ये दीवार घड़ी
फिर अपने हिज्र की दीवार गिराना है मुझे
"निरा" तू देख ख़ुद को रख के ज़माने से परे
कि पहले तू है उस के बा'द ज़माना है मुझे
— Nishant Choudhary















