मोहब्बत में किसे आबाद देखा है
जिसे देखा उसे बर्बाद देखा है
कभी दी थी ज़बाँ ख़ुद की परिंदे को
उसी को क़ैद से आज़ाद देखा है
तवज्जोह भी नहीं रुसवा नहीं अब तक
उसे ही फिर ख़ुदा के बा'द देखा है
लुटी हस्ती लुटी कश्ती लुटा सब कुछ
अजब मंज़र दिला कर याद देखा है
हजारों शहर देखे फिर किसी बाबत
न जाने कब इलाहाबाद देखा है
कहाॅं रौशन हुए ये घर बताओ यूँॅं
चराग़ों को भी ज़िंदाबाद देखा है
— Niteesh Upadhyay














