हर दिन एक फ़साद करोगे
क्या दुनिया बर्बाद करोगे
चिंगारी से यूँ मत खेलो
मिटकर क्या संवाद करोगे
इस को छेड़ा उस को छेड़ा
कितना और विवाद करोगे
नूर-ए-ख़ुदा है हर इंसाँ में
फिर किसको नाशाद करोगे
मुफ़लिस पर यूँ धौंस जमाकर
कैसे जग आबाद करोगे
सबके दुश्मन बन बैठे हो
किससे ग़म रूदाद करोगे
क्या कहते हो कुछ न चला तो
विक्टिम कार्ड ईजाद करोगे
बेईमानी की भी हद है
कहते हो कि ज़िहाद करोगे
ऐ 'उपमन्यु' भुलाकर रब को
और कहाँ फ़रियाद करोगे
— Nityanand Vajpayee















