उस का दिया वो दाग़ छुपाया न जाएगा
हैवान सर पे और बिठाया न जाएगा
जलता है आग में तो जले और भी मज़ीद
ग़द्दार का मकाँ है बचाया न जाएगा
उस ने ज़लील कर के निकाला था बज़्म से
सो बज़्म में उसे भी बुलाया न जाएगा
मेरी ही आस्तीं में पला डस के चल दिया
आघात उस ग़लीज़ पे ज़ाया न जाएगा
'उपमन्यु' चाहे ख़ुद को मिटाना पड़े मुझे
बाज़ार झूठ का यूँ लगाया न जाएगा
— Nityanand Vajpayee















