रोक लो मुझ को लाश होने से

बे-वफ़ा ख़ुद को काश होने से

तुम जो दो साथ कौन रोकेगा
फिर मुझे ख़ुश-मआश होने से

दिल का क्या लेना-देना है आख़िर
जिस्म के ख़ुश-तराश होने से

मौत पहले ही हो गई दरयाफ़्त
ज़िंदगी की तलाश होने से

सब मुखौटे उतार फेंकूँगा
पेशतर पर्दा-फ़ाश होने से

एक से एक शे'र निकलेंगे
बे-तहाशा हताश होने से

किर्चियाँ तो चुभेंगी तुम को भी
दिल मिरा पाश-पाश होने से

बस मोहब्बत ही रोक सकती है
ज़िंदगी का विनाश होने से

चाँद-तारे नज़र नहीं आते
वो बदन बर्क़-पाश होने से

ख़ुद नदामत से ही मरोगे तुम
या 'मिलन' पर्दा-फ़ाश होने से

— Milan Gautam

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