ग़मों को समेटे चले जा रहे हैं
मुसाफ़िर अकेले चले जा रहे हैं
ख़िज़ाँ का है मौसम निबाहें तो कैसे
शजर से परिंदे चले जा रहे हैं
सहर हो रही है दरीचे से उन के
फ़लक से सितारे चले जा रहे हैं
धड़कता हुआ ख़त उन्होंने था भेजा
उसी को सँभाले चले जा रहे हैं
जिधर को गई थी दिवानों की टोली
उधर ही ज़माने चले जा रहे हैं
— Prashant Prakhar















