भीड़, भीड़, भीड़, इतनी भीड़ यारा बेहिसाब
दरमियान इसके फिर भी दिल है तन्हा बेहिसाब
हिज्र के सिरे पे हम हैं फिर ये क्या है जो जुड़ा
जितना दूर मैं गया वो याद आया बेहिसाब
इक ज़रा सी ज़िन्दगी, दो छोटी छोटी जान और
इक ज़रा से रिश्ते में है शिकवा इतना बेहिसाब
सुनने को झुको ज़रा तो बात अपनी मैं कहूँ
अदना सा मैं आदमी, ये क़द तुम्हारा बेहिसाब
लब पे माफ़ी है मगर इन आँखों में है क्या छुपा
लफ़्ज़ कर रहे हैं मुझ सेे क्यूँँ इशारा बेहिसाब
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