log baithe hain jigar ko thaam ke | लोग बैठे हैं जिगर को थाम के

  - Prashant Beybaar

लोग बैठे हैं जिगर को थाम के
ऐसे क्या किस्से तुम्हारे नाम के

दिन तो सारे मुफ़लिसी में ढल गए
हैं रईसी के नज़ारे शाम के

तुम शहर में क्या हुए दाख़िल सनम
आदमी बाक़ी नहीं अब काम के

नींद के तो दिन वही थे साथ में
अब तो बस लम्हे बचे आराम के

हद जुदाई की है बस इक 'क्लिक' यहाँ
दौर बीते ख़त के और पैग़ाम के

इक बड़ा बाज़ार है ये ज़िन्दगी
आदमी मिलते यहाँ हर दाम के

  - Prashant Beybaar

Zindagi Shayari

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