उठते हैं बुलबुले जो सभी इंतिशार के रह-रह के याद क़िस्से दिलाते हैं हार केमुझ को यक़ीन उस पे ज़्यादा है इस लिएदेखे हैं मैं ने मोजिज़े परवरदिगार के— Prashant Sitapuri