हमारे काम की दुनिया नहीं है
अगर है भी तो कह देना नहीं है
सुनाता शे'र मैं भी अच्छे अच्छे
मगर महफ़िल में वो चेहरा नहीं है
मैं उस की बात में फिर से आ जाऊँ
अब उस के पास वो लहजा नहीं है
मुहब्बत करना लेकिन याद रखना
तुम्हें बर्बाद भी होना नहीं है
मुझे आदत नहीं है चीखने की
तुम्हें भी बोलना आता नहीं है
समझ लों तो समझ लेना ख़मोशी
मुझे वैसे तो कुछ कहना नहीं है
ग़ज़ल का एक मिसरा है समझना
वो इक मिसरा फ़क़त मिसरा नहीं है
— Prashant Rao chourase















