किसी का ख़्वाब नहीं जा रहा है आँखों से

मैं रतजगे में हूँ कुछ पाँच सात रातों से

मुझे वो मुझ से नज़र आते थे उदास उदास
मैं बात करता था जंगल के सूखे पेड़ों से

वो शाहजादी कोई तारा बन चुकी है अब
मैं जिस को माँगता था टूटते सितारों से

हुनर से काम लिया पेंट ब्रश नहीं तोड़ा
बना लिया तेरे जैसा ही कोई रंगों से

मुझे ये डर है कि मिल जाएगी तो रो दूँगा
मैं जिस ख़ुशी को तरसता रहा हूँ बरसों से

— Rahul Gurjar

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