सीने से अपने दुख भरे दिल को निकाल कर

मैं सोचता हूँ क्या मिला इस दिल को पाल कर

मैं गाँव से निकल पड़ा था शहर की तरफ़
सिक्का लिए जो रक्खा था मैं ने सँभाल कर

तू ने तो सोचते हुए देखा है हम को यार
हम फ़ैसले भी करते थे सिक्का उछाल कर

तुम ने जो इक परी दर-ए-दरगाह छोड़ी थी
इक बाँझ ने रखा उसे नाज़ों से पाल कर

मैं आदमी हूँ यार कोई काम तो नहीं
ऐसा भी क्या सुकून मिला मुझ को टाल कर

— Rahul Gurjar

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