फूल छत पे खिल गए पर ताज़गी खोते गए
हम बहुत कर के तरक्क़ी सादगी खोते गए
था पिता पर बोझ तो हम दिल-लगी में चूर थे
बोझ जब ख़ुद पर पड़ा तो दिल-लगी खोते गए
दो कदम पर ज़िंदगी थी इक कदम पर मौत थी
ज़िंदगी की चाह में ही ज़िन्दगी खोते गए
दूरियाँ थीं कम तो ये नाराज़गी बढ़ती गई
दूरियाँ जब बढ़ चलीं नाराज़गी खोते गए
तीरगी से थी भरी हर राह जीवन की मिरी
माँ दुआ देती गई हम तीरगी खोते गए
— Rituraj kumar















