kyun chhupa rahi ho tum khud ko simran | क्यूँँ छुपा रही हो तुम ख़ुद को सिमरन

  - Saahir

क्यूँँ छुपा रही हो तुम ख़ुद को सिमरन
मुझको तुम अच्छी लगती हो सिमरन

काम बनाया मैने मुहब्बत को यूँँ
दो बोसे तनख्वाह है मुझको सिमरन

कुछ दिन से उदास हैं मेरी आँखें
कुछ दिन से नहीं देखा तुमको सिमरन

सबने मुझको दर्द दिया तेरे बाद
हँसकर मैने जलाया सबको सिमरन

तुमने राधा को देखा है क्या दोस्त
मेरी नज़र से यूँँ दिखती हो सिमरन

लगा लिया काज़ल तेरे जैसे ही
मेरी ओर ज़रा सा देखो सिमरन

  - Saahir

Aawargi Shayari

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