हूँ एक नदी सी मैं पर आग में हूँ जलती
ये एक कमी मुझ को बस यार रहे खलती
है साथ सनम मेरे पर पास नहीं है वो
हर बार मिरी क़िस्मत है चाल नई चलती
वो बद्र क़मर जैसे मैं रात अमावस की
होगा ये मिलन कैसे ये उम्र रहे ढलती
दीदार सनम का हो बेचैन मिरी आँखें
मैं हिज्र में बस उस के दिन रात रहूँ जलती
ये खेल बड़ा मुश्किल जो हार गई हूँ मैं
आसान इसे समझा बस थी ये मिरी ग़लती
— Rubball















