पा भी लिया खो भी दिया मैं ने जिसे

कोई सुनाए हाल उस का भी मुझे

मग़रूर अब भी वो ख़ुदी में है सनम
या वो तड़पता है मिरे ही वास्ते

उस की महक अब भी बदन में है मिरे
कोई मिरा रूमाल दे आए उसे

वो लौट कर फिर पास जो आए मिरे
मैं बंद कर दूँ वापसी के रास्ते

सूई चुभे तो दर्द भी होता नहीं
बे-जान हूँ कोई बताए ये उसे

मुँह फेर लेने से हक़ीक़त से सनम
यूँ ख़त्म होते हैं नहीं कुछ राब्ते

— Rubball

More by Rubball

Other ghazal from the same pen

See all from Rubball →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling