"पीरी"
सुनो जब वक़्त गुज़रेगा तुम्हारे ज़िस्म से होकर
लकीरें याद की रुख़ पर तुम्हारे छोड़ जाएगा
ये ढलती उम्र ख़ुद की फिर न तुम को रास आएगी
दग़ा कर आइना भी तुम से नाता तोड़ जाएगा
सभी सामान ओ साज़-ए-नाज़ तुम को बे-सबब होंगे
तुम्हारा दिल सँवरने से भी जब मुँह मोड़ जाएगा
तब अपने घर की छत पर बैठ यादों की किताबों में
मेरे क़िस्सों मेरी बातों के पन्नों पर नज़र करना
मेरे एहसास की बू का 'सलिल' ये इत्र सौंधा सा
तुम्हारी साँस में मेरी महक इक छोड़ जाएगा
— Surendra Bhatia "Salil"















