ज़िंदगी इक फ़िल्म है मिलना बिछड़ना सीन हैं
आँख के आँसू तिरे किरदार की तौहीन हैं
एक ही मौसम वही मंज़र खटकने लगता है
सच ये है हम आदतन बदलाव के शौक़ीन हैं
नींद में पलकों से मेरी रंग छलके रात भर
आँख में हैं तितलियाँ तो ख़्वाब भी रंगीन हैं
राह तकती रात का ये रंग है तेरे बिना
चाँद भी मायूस है तारे भी सब ग़मगीन हैं
उँगलियों पे गिन मिरी तन्हाइयों के हम सेफ़र
इक उदासी जाम दूजा याद तेरी तीन हैं
क़ाएदे से कब जिया है ज़िंदगी मैंने तुझे
मैं तिरा मुजरिम हूँ मेरे जुर्म तो संगीन हैं
ख़ुशनुमा माहौल था कल तक थिरकते थे सभी
आज आख़िर क्या हुआ है लोग क्यूँ ग़मगीन हैं
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Sandeep Thakur
our suggestion based on Sandeep Thakur
As you were reading Raasta Shayari Shayari