एक लम्हा भी क्यूँ क़रार नहीं
दिल बुझा तो है सोगवार नहीं
तुम तसल्ली तो दे रहे हो मुझे
ग़म पे क्यूँ मुझ को इख़्तियार नहीं
दिल से ज़िंदा हो तो रहो दिल में
दिल है मेरा कोई मज़ार नहीं
मौत ही जब नजात दे ग़म से
क्यूँ हमें उस का इंतिज़ार नहीं
अक्स दिख तो रहा है शीशे में
मेरे चेहरे पे वो बहार नहीं
तेरे हाथों में क्यूँ ये पत्थर है
अब किसी को किसी से प्यार नहीं
लोग और भी तो जल रहे हैं यहाँ
सिर्फ़ तेरा ही ये ग़ुबार नहीं
— Sanjay Bhat















