होती है ज़िंदगी से शिकायत कभी कभी
याद आती है किसी की रफ़ाक़त कभी कभी
वैसे तो हम नहीं हैं तिरी बात के ख़िलाफ़
मर जाती है मगर ये शराफ़त कभी कभी
इतना न ख़ुद को देख ज़माने की आँख से
दे दे कुछ अपनी आँख को ज़हमत कभी कभी
यूँ तो रखा है दर्द को सीने के पास पास
होती है फिर भी दर्द से वहशत कभी कभी
कोई तो बात छेड़ तू अपने रक़ीब से
बेहतर है दुश्मनी से मोहब्बत कभी कभी
शरमा के फिर से देख हमारे क़रीब आ
मिलती है दिल-लगी में सुहूलत कभी कभी
— Sanjay Bhat















