"पत्ता और गुल"
ख़ुश्क पत्ता हूँ जो गुल बनने चला था
पर उसी डाली पे मैं भी तो खिला था
क्यूँ न आई मुझ से ख़ुशबू गुल के जैसी
यूँ तो मैं भी साथ उन के ही पला था
रंग था मेरा तो बस इक ही तरह का
रंग हर गुल को चटक सा भी मिला था
सब ने रौंदा क्यूँ गिरा जो शाख़ से मैं
यूँ उसी सूरज से मैं भी तो जला था
वो ही मिट्टी थी रहा मौसम भी वो ही
क्या निहाँ था फिर कि जिस शय ने छला था
— Sanjay Bhat















