"कश्मीर- एक पानी का बुलबुला"
रेत की एक गर्म चादर पर
एक पानी का बुलबुला है ये
आप कश्मीर जिस को कहते हैं
जन्नत-ए-बे-नज़ीर कहते हैं
सच कहें तो ये बुलबुला है वो
वक़्त-बे-वक़्त फूटता है जो
और इस बुलबुले के फूटने से
एक तूफ़ान ऐसा उठता है
जिस की ज़ालिम गिरिफ़्त में आ कर
जाने कितने ही घर तबाह हुए
कुछ तो घर छोड़ के चले ही गए
खेत और बाग़ भी वो छोड़ चले
ख़ौफ़ की महफ़िलों से दूर कहीं
टेंट में रहने को ज़लील हुए
रंग चेहरों के धुल गए सब के
लोग अपनों से दूर दूर हुए
ख़्वाब कितने ही चूर चूर हुए
मौत का खेल भी तो खेला गया
क़त्ल कुछ लोग भी हुए हैं यहाँ
बच गए जो वो दिल-मलूल हुए
ज़ेहनी बीमारियों से चूर हुए
अब खंडर हो गए हैं वो जो कभी
घर थे खिलते हुए महकते हुए
लोग कुछ आज भी ख़मोश हैं क्यूँ
जैसे कुछ भी यहाँ हुआ ही नहीं
ये ही कह के जहाँ में सब चुप हैं
बुलबुला ये तो फूटना ही था
फिर बनेगा ये फिर से फूटेगा
किस का इस में है हाथ मत पूछो
हाथ माज़ी की कुछ ख़ताओं का है
किसी ज़ाती मफ़ाद की ख़ातिर
एक चादर को गर्म रक्खा गया
ताकि ये बुलबुला सदा ही फटे
और तूफ़ान का सबब ये बने
फिर किसी माँ की आँख नम ही रहे
उम्र भर उस को दर्द-ओ-ग़म ही रहे















