अगर इश्क़ से ये जहाँँ शाद होता
तो हर शख़्स मजनूँ व फ़रहाद होता
जो आपस में दस्त-ओ-गिरीबाँ न होते
मुसल्लत न हम पे ये जल्लाद होता
पढ़ाता सबक़ कौन तहज़ीब का फिर
अगर कोई अपना न उस्ताद होता
वो बारिश का मौसम वो मिलना हमारा
वो दिन काश तुमको ज़रा याद होता
ख़ुदाया अमल कोई ऐसा हो मुझ सेे
के इन'आम बस वो परीज़ाद होता
जो मिलता मुझे गर वो महबूब-ए-शीरीं
तो मुश्ताक़ मैं कितना दिलशाद होता
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