नाराज़गी हज़ार हो उस बे-वफ़ा के साथ

लेकिन है इश्क़ फिर भी उसी दिल-रुबा के साथ

क़ासिद न पूछ आज मेरी बेबसी का हाल
आई थी ज़िंदगी मुझे मिलने क़ज़ा के साथ

बस इस लिए अज़ीज़ है बाद-ए-सबा हमें
आती है उस की याद भी बाद-ए-सबा के साथ

यूँ ही नहीं गिरी है मेरे आशियाँ पे बर्क़
साज़िश हुई है अब्र की कुछ तो हवा के साथ

गर जानते कि इश्क़ ठहर जाएगा गुनाह
हरगिज़ न दिल लगाते किसी पारसा के साथ

मुश्ताक़ फिर चले हो उसी मय-कदे को तुम
शायद कि फिर मिले हम उसी आश्ना के साथ

— Saqlain Mushtaque

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