वो आँखें ख़ूब-सूरत हैं वो चेहरा ख़ूब-सूरत है
उसे देखा तो जाना ये कि दुनिया ख़ूब-सूरत है
करें तो हम करें कैसे बयाँ उस के बयानों का
है शीरीं गुफ़्तुगू उस की वो लहजा ख़ूब-सूरत है
जबीं रौशन है रौशन आरिज़-ओ-गुलफ़ाम-लब उस के
कहूँ क्या क्या भला तुम से वो कितना ख़ूब-सूरत है
हया भी है निगाहों में अदाएँ भी बला की हैं
और उस पर बर्क़ नज़रों का इशारा ख़ूब-सूरत है
बजा मुश्ताक़ बेहद ख़ूब-सूरत हैं जहाँ वाले
किसे देखूँ मगर अब कौन तुझ सा ख़ूब-सूरत है
— Saqlain Mushtaque















