चार दिन जीने दो गुमानी में
है मिरा यार हुक्मरानी में
शा'इरी भी शराब जैसी है
है ज़ियादा मज़ा पुरानी में
इक सफ़र जो डराता है मुझ को
सात फेरे हैं शेरवानी में
हर किसी ने मज़ा लिया इस का
कौन बिगड़ा नहीं जवानी में
बस यही है मिरी अदाकारी
मैं कहानी रहा कहानी में
— Saurabh















