मयकशी ही काम है
क्यूँ कहें हराम है
मय नहीं तो बज़्म में
ख़ाक इन्तेज़ाम है
तुम हो मेरे सामने
तब ये जाम जाम है
तुम हो मेरे हम सफ़र
क्या हसीन शाम है
अब हर एक आदमी
नफ़्स का ग़ुलाम है
ग़ौर कीजिए जनाब
ग़ौर का मुक़ाम है
है ग़रीक़-ए-तीरगी
शम्अ' जिस का नाम है
नाम राम है मगर
रावनों का काम है
आप ही के शहर में
आज कल क़याम है
— Shadab Shabbiri















