"वो दिन अब नहीं"
तुम्हारे घर के दरवाज़े से जो इक कच्ची सड़क जाती थी मेरे घर की जानिब को
कि जिस के जिस्म पर बारिश की जब बूँदें मचलती थीं
तो सौंधी सी कोई ख़ुशबू दिमाग़-ओ-रूह की गहराइयों में रक़्स करती थी
मैं अक्सर बारिशों में उस सड़क पर सैर करता था
कभी बचकर कभी गिरके तुम्हें मिलने को ऐसी बारिशों से बैर करता था
मगर अब उस सड़क का हुस्न थोड़ा ढल गया है,
नया लिबास है सी
मेंट का कोई ख़ुशबू नहीं उठती
सड़क चौड़ी हुई है पर दिलों के दरमियाँ जो पगडंडी थी कच्ची सी बहुत तंग हो गई है
— Shadab khan















