chehre ki taraf uske agar dekh raha hooñ | चेहरे की तरफ़ उसके अगर देख रहा हूँ

  - Shajar Abbas

चेहरे की तरफ़ उसके अगर देख रहा हूँ
तो लगता है जैसे मैं क़मर देख रहा हूँ

कोई नहीं डरता है हक़ीक़त में ख़ुदा से
बातों में महज़ सबके में डर देख रहा हूँ

हक़ बात करे जो उसे सूली पे चढ़ा दो
शाया ये रिसालों में ख़बर देख रहा हूँ

हो ख़ैर तेरे बाग़ की ऐ बाग़ के माली
मैं ख़ार पे फूलों का ठहर देख रहा हूँ

जो तन से जुदा हो के है मसरूफ़-ए-इबादत
नेज़े की बुलंदी पे वो सर देख रहा हूँ

दिल ले गया ये कह के वो अनजान हमारा
मैं आपको बस एक नज़र देख रहा हूँ

लगता है बहुत रोया है तू याद में उसकी
पौशाक़ तेरी ख़ून में तर देख रहा हूँ

आता है महज़ मुझको नज़र चेहरा तुम्हारा
मैं क़ल्ब की बस्ती में जिधर देख रहा हूँ

सर रक्खा है पहलू मैं मेरे आपका दिलबर
मैं ख़्वाब ये हर शाम-ओ-सहर देख रहा हूँ

छाया-ओ-समर देता है जो सारे जहाँ को
वो धूप में तन्हा मैं शजर देख रहा हूँ

  - Shajar Abbas

Garmi Shayari

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