चेहरे की तरफ़ उसके अगर देख रहा हूँ
तो लगता है जैसे मैं क़मर देख रहा हूँ
कोई नहीं डरता है हक़ीक़त में ख़ुदा से
बातों में महज़ सबके में डर देख रहा हूँ
हक़ बात करे जो उसे सूली पे चढ़ा दो
शाया ये रिसालों में ख़बर देख रहा हूँ
हो ख़ैर तेरे बाग़ की ऐ बाग़ के माली
मैं ख़ार पे फूलों का ठहर देख रहा हूँ
जो तन से जुदा हो के है मसरूफ़-ए-इबादत
नेज़े की बुलंदी पे वो सर देख रहा हूँ
दिल ले गया ये कह के वो अनजान हमारा
मैं आपको बस एक नज़र देख रहा हूँ
लगता है बहुत रोया है तू याद में उसकी
पौशाक़ तेरी ख़ून में तर देख रहा हूँ
आता है महज़ मुझको नज़र चेहरा तुम्हारा
मैं क़ल्ब की बस्ती में जिधर देख रहा हूँ
सर रक्खा है पहलू मैं मेरे आपका दिलबर
मैं ख़्वाब ये हर शाम-ओ-सहर देख रहा हूँ
छाया-ओ-समर देता है जो सारे जहाँ को
वो धूप में तन्हा मैं शजर देख रहा हूँ
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