दिल जो कहता है तेरा तू उसे मंज़ूर न कर
मुझसे मत दूर हो ख़ुद से तू मुझे दूर न कर
ऐ मेरी हूर मेरी हूर मेरी हूर न कर
ख़ुल्द से जाता हूँ मैं ख़ुद को तू रंजूर न कर
ख़ुदकुशी करने को मैं जीने से बेहतर समझूँ
ज़िंदगी बहर-ए-ख़ुदा ऐसा भी मजबूर न कर
ज़ख़्म जो हज़रत-ए-दिल पर है मेरी बात को सुन
ज़ख़्म की कर ले दवा ज़ख़्म को नासूर न कर
ख़ाक से जिस्म बना ख़ाक में मिल जायेगा
ऐ शजर ख़ुद को तू इस ख़ाक पे मग़रूर न कर
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