हुस्न करता है बदन की आ के दरबारी मेरी
यूँँ मुसलसल देखिए तक़रीर है जारी मेरी
मिस्ल-ए-यूसुफ़ मिस्र के बाज़ार में आया हूँ मैं
दौर-ए-हाज़िर की ज़ुलैख़ा कर ख़रीदारी मेरी
दिल के होंटों पर दुआ है मौत दे देना ख़ुदा
गर महाज़-ए-इश्क़ पर हो जो गिरफ़्तारी मेरी
जो नए ज़रदार थे कम-ज़र्फ़ वो हँसते रहे
सुन के सब रोने लगे लाचार लाचारी मेरी
हुस्न की चौखट पे दिल ने सर को ख़म कर के कहा
मत बढ़ा बहर-ए-ख़ुदा तू और दुश्वारी मेरी
सरहद-ए-दिल पर ख़ियाम-ए-इश्क़ लगने लग गए
यानी होने जा रही है अब जिगर-ख़्वारी मेरी
क़हक़हे मैंने निकाले हैं उदासी खोदकर
देखकर हैरान हैं फ़नकार फ़नकारी मेरी
मैं मरीज़-ए-इश्क़ हूँ बोलो शजर मैं क्या करूँँ
ख़त्म होने में नहीं आती ये बीमारी मेरी
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