'इश्क़ करते थे 'इश्क़ करते हैं
तुम पे मरते थे तुम पे मरते हैं
रक़्स करती हैं मौजें दरिया की
जब वो दरिया से मश्क भरते हैं
जिससे डरना है उससे डरते नहीं
बाक़ी अहल-ए-जहाँ से डरते हैं
देखकर फूल को बिखरते हुए
भँवरे सीने पे हाथ धरते हैं
कितने अहमक़ हैं ये शजर साहब
उनके कूचे से ही गुज़रते हैं
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