दुश्मनों ने 'इश्क़ के क्या कर दी हालत क़ैस की
क़ैस पर गिर्या-कुनाँ हैं देखो ग़ुर्बत क़ैस की
शहर-ए-ना-पुरसाँ में ले आया मुक़द्दर क़ैस को
किर्दगार-ए-दो-जहाँ करना हिफाज़त क़ैस की
मुँह को आता है कलेजा मेरा बे ग़ुस्ल-ओ-कफ़न
हाल-ए-अफ़सुर्दा में हैं सहरा में मय्यत क़ैस की
मर के राह-ए-इश्क़ में मिलती है आशिक़ को हयात
भूल मत जाना जवानों ये नसीहत क़ैस की
ख़ून-ए-ना हक़ जो बहा है लाएगा वो इंक़लाब
राइगाँ हरगिज़ न जाएगी शहादत क़ैस की
करने से पहले कुदूरत सोच लेना क़ैस से
ले के जाएगी जहन्नम में कुदूरत क़ैस की
अपने घर से दस्त-ए-चप में 'इश्क़ का परचम लिए
नौजवाँ निकले हैं लैला करने नुसरत क़ैस की
सल्तनत पे 'इश्क़ की रोज़-ए-अजल से हश्र तक
देखना बाक़ी रहेगी ये हुकूमत क़ैस की
हज़रत-ए-राँझा हों वो के हज़रत-ए-फ़रहाद हों
हर किसी पे दोस्तों वाजिब है बैअत क़ैस की
वक़्त रहते गर नहीं बेदार होते हम शजर
मुंहदिम कर देते दुनिया वाले तुर्बत क़ैस की
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