जिसको फूलों से मोहब्बत शायरी से 'इश्क़ है
मुझको इस दुनिया में बस उस आदमी से 'इश्क़ है
जैसे भँवरे को चमन में इक कली से 'इश्क़ है
वैसे ही मुझको जहाँ की इक परी से 'इश्क़ है
है किसी से मुझको मुझसे और किसी को 'इश्क़ है
मुझको जिससे 'इश्क़ है उसको किसी से 'इश्क़ है
कू-ए-जानाँ जन्नत-उल-फ़िरदौस से कमतर नहीं
इसलिए वा'इज़ मुझे उसकी गली से 'इश्क़ है
मौत की चीखें निकलने लग गईं ये जान कर
ज़िंदगी को मुझसे मुझको ज़िंदगी से 'इश्क़ है
किसलिए साहिल पे जाकर बैठते हो शाम को
इसलिए साहिब हमें इक जल-परी से 'इश्क़ है
ख़ौफ़ जिसकी दुश्मनी का खाते हैं अहल-ए-जहाँ
देखिए हमको उसी की दुश्मनी से 'इश्क़ है
दुनिया वाले रौशनी से 'इश्क़ करते हैं शजर
और इक हम हैं के हमको तीरगी से 'इश्क़ है
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