लब पर है उनके वक़्त-ए-सफ़र मुतमइन नहीं
मंज़िल पे है हमारी नज़र मुतमइन नहीं
गर कहकशाँ ये शम्स-ओ-क़मर मुतमइन नहीं
तो रात दिन ये शाम-ओ-सहर मुतमइन नहीं
इक रोज़ हिचकिचाते हुए उसने ये कहा
मैं हूँ तुम्हारे साथ मगर मुतमइन नहीं
जो कैफ़ियत है उनकी वो कैसे बयान हो
सुनकर मेरी क़ज़ा की ख़बर मुतमइन नहीं
हम से किनारा कर के चला जाए वो शजर
कोई हमारे साथ अगर मुतमइन नहीं
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