मान लेते हैं जो कहते हो सनम याद किया
याद हर वक़्त किया फिर भी तो कम याद किया
तेग़-ए-अबरू से जो ढाया था सितम वक़्त-ए-विसाल
बाद-ए-फ़ुर्क़त वो तिरा यार सितम याद किया
जानिब-ए-मंज़िल-ए-फ़ुर्क़त जो ये दिल बढ़ने लगा
मंज़िल-ए-वस्ल को हर एक क़दम याद किया
बर सर-ए-राह-ए-मुहब्बत जो खुले ज़ख़्म-ए-जिगर
आह की हमने फ़क़त तुमको सनम याद किया
मैंने पल भर को नहीं बुझने दिया ग़म का दिया
हर घड़ी तेरा शजर रंज-ओ-अलम याद किया
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