सुकून-ए-क़ल्ब है मेरा तबीब की बेटी
अँगूठी हूँ मैं नगीना तबीब की बेटी
तुम्हारी माँगी हुई सब दुआएँ लाई रंग
लो हो गया मैं तुम्हारा तबीब की बेटी
गले लगा के मुझे अपने हौसला बख़्शो
हूँ रंज-ओ-ग़म का मैं मारा तबीब की बेटी
तुम्हारा दीद किए बिन सुकूँ नहीं मिलता
ये हाल क्यूँ हैं हमारा तबीब की बेटी
हसीन देखे हैं मैंने जहाँ में लाख मगर
हसीन तुमसा ना देखा तबीब की बेटी
ये चाँद तारे चमन सहरा नदियाँ झीलें शजर
है सबका सब तेरा सदक़ा तबीब की बेटी
तुम्हारे हुस्न का और लहजे की नज़ाकत का
है मेरे यारों में चर्चा तबीब की बेटी
तुम्हारे शहर में आकर एक अजनबी की तरह
भटक रहा हूँ मैं तन्हा तबीब की बेटी
अता जो ज़ख़्म मुझे कर रही हो हँसकर तुम
ये ज़ख़्म कैसे भरेगा तबीब की बेटी
ग़ज़ल हुई है मुक्कमल तेरे तसव्वुर में
सो दिल से शुक्रिया तेरा तबीब की बेटी
मरीज़-ए-इश्क़ शजर है इलाज कर दो तुम
तड़प रहा है बेचारा तबीब की बेटी
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