सर मज़ार-ए-क़ैस पे जिस रोज़ ख़म हो जाएगा
दर्द-ए-दिल दर्द-ए-मुहब्बत ख़ुद ही कम हो जाएगा
हुक्म-ए-हाकिम है मनादी दे रहा है ये सदा
हक़ बयाँ करने लगोगे सर क़लम हो जाएगा
जिससे रंजिश है यक़ीं है हमको उससे एक दिन
'इश्क़ होगा और फिर वो मोहतरम हो जाएगा
और बढ़ जायेगी क़ीमत अलक़मा के आब की
अश्क मेरी आँख का गर इस
में ज़म हो जाएगा
ऐसे ही चलता रहा तो देख लेना तुम शजर
ये सनम रब और इक दिन रब सनम हो जाएगा
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