शजर की आँखें लहू में तर हैं शजर के लब पर सजे हैं नाले
मुनाफ़क़त का लिबास ओढ़े खड़े हैं मेरे क़बीले वाले
हुई है मुझसे उसे मोहब्बत तो उसपे लाज़िम है ऐसा करना
सखी की सोहबत को तर्क कर के वो मेरी सोहबत में ख़ुद को ढाले
सजा हुआ है वफ़ा का मक़तल है अब भी मौक़ा तू मान मेरी
मैं कर दूँ ख़ुद को तिरे हवाले तू ख़ुद को कर दे मिरे हवाले
ख़िलाफ़-ए-ज़ालिम ख़िलाफ़-ए-ज़ुल्मत लबों को जुंबिश दे गर है ज़िंदा
शजर विरासत है ख़ानदानी जो तेरी उसको उठ और बचा ले
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