है शोर चारों सिम्त दिल-ए-बे-क़रार में
गुलशन में गुल दिखाई दिए दस्त-ए-ख़ार में
कुछ भी नहीं था बाद तिरे इख़्तियार में
रो रो के 'उम्र काटी गई इंतिज़ार में
हमने निगाह-ए-नाज़ से वाइज़ बहिश्त के
मंज़र तमाम देख लिए कू-ए-यार में
मत कर तू नौजवान मोहब्ब्त का कारोबार
तारीख़ है ख़सारा है इस कारोबार में
लानत हो उन तमाम पे परवरदिगार की
शामिल हैं जितने लोग 'शजर' इंतिशार में
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