तेरी यादों के बिन दिल का नगर वीरान लगता है
हक़ीक़त आज बतलाऊँ ये क़ब्रिस्तान लगता है
परी को नोच देता है हवस अपनी मिटाने को
मुझे इस दौर का इंसान इक हैवान लगता है
मोहब्बत का जो हामी बन रहा है वो नया लड़का
यक़ीनन दर्द से फ़ुर्क़त के वो अनजान लगता है
भरोसा सब पे कर लेता है आँखें मूँद कर पागल
उसे हर शख़्स जो है साहिब-ए-ईमान लगता है
तेरी फ़ुर्क़त के ग़म ने हाल ऐसा कर दिया मेरा
कि अब जीना ज़माने में बड़ा नुकसान लगता है
ख़ुदा का वास्ता देते हैं तुमको अब पलट आओ
हमारा दिल कहीं तुम बिन नहीं ऐ जान लगता है
हमारे साथ में शाना मिलाकर जब भी चलते हो
क़सम से पुर-ख़तर हर रास्ता आसान लगता है
कभी ख़िदमत नहीं करता है तू मुफ़्लिस की बेकस की
बता तू कौन से रुख़ से भला इंसान लगता है
अगर वो लब हिलाता है चमन में फूल गिरते हैं
गुलिस्ताँ का शजर भँवरा हमें सुलतान लगता है
ज़ियारत से शजर महरूम ही मर जाएँगे उसकी
अधूरा दिल का रह जाएगा हर अरमान लगता है
शजर जब देखता हूँ मैं कभी रंगीं ज़माने को
कहीं गुलशन कहीं सहरा कहीं शमशान लगता है
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