वो शज्जू कह के सदा पास में बुलाती थी
फिर उसके बाद गले से मुझे लगाती थी
सहेली उसको मेरे नाम से चिढ़ाती थी
वो मेरे नाम पे शर्मा के मुस्कुराती थी
मैं अपनी ग़ज़लों में सब उसका हुस्न लिखता था
सहेलियों को वो ग़ज़लें मेरी सुनाती थी
मैं रोज़ उसकी गली से गुज़र के जाता था
वो मुझको देखने खिड़की पे अपनी आती थी
हिना से अपनी हथेली पे वो शजर लिखकर
लबों से चूमती थी सखियों को दिखाती थी
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