ये सोचकर मिटा दिया क़ल्ब-ए-नियाज़ को
कब तक अदा मैं करता हुदूदे जवाज़ को
सर ख़म तो कीजिए ज़रा आग़ोश-ए-इश्क़ में
हाथों से हम सँवारेंगे ज़ुल्फ़-ए-दराज़ को
होने न देंगे दुनिया में तज़्लील-ए-जान-ए-जाँ
कर लेंगे दफ़्न क़ल्ब में फुर्क़त के राज़ को
ये कौन हक़ में मेरे मुसल्ले पे एहल-ए-सुब्ह
महव-ए-दुआ ख़ुदा से है उम्र-ए-दराज़ को
रख कर दहन पे मेरे दहन ऐ मेरे सनम
दस्त-ए-शिफ़ा दो आप मरीज़-ए-अयाज़ को
है दस्त बस्ता आपसे ये इल्तिजा मेरी
लिल्लाह ख़त्म कीजिए रस्म-ए-मजाज़ को
क़ल्ब-ए-हज़ी ये करता है हसरत मता-ए-जाँ
पल्लू पे मैं अदा करूँँ तेरे नमाज़ को
अशआर वैसे मुझको अता कर दे किबरिया
अशआर तूने जैसे दिए थे फ़राज़ को
ख़ून-ए-जिगर से सीने पे किर्तास के गिला
तहरीर करके भेज दिया 'इश्क़ बाज़ को
ऐ बेवफ़ा तू देख ले ये आ के अब तलक
रक्खा है राज़ मैंने सदा तेरे राज़ को
जब कश्ती दरमियान-ए-भँवर आ गई मेरी
दिल ने सदा लगाई शजर कार साज़ को
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