“हवस”
नए अंदाज़ में घर से हवस की ओढ़ कर चादर
निकल आई हैं आँखें हुस्न का बाज़ार करने को
इलाही ख़ैर हो इस हुस्न की इन हुस्न वालों की
मुझे डर है हवस ग़ालिब न आ जाए कहीं दिल पर
मुझे डर है कहीं ये बर सर-ए-बाज़ार ऐ मालिक
दिल-ए-नादाँ कोई ग़लती न कर बैठे मुझे डर है
कहीं ये हुस्न को बाज़ार में रुसवा न कर डाले
मुझे ये डर सताता है ख़ुदा-ना-ख़्वास्ता यूसुफ़
कहीं ये हुस्न की क़ीमत लगाने की न ज़िद कर ले
नए अंदाज़ में घर से हवस की ओढ़ कर चादर
निकल आई हैं आँखें हुस्न का बाज़ार करने को
— Shajar Abbas















