“ख़त “
मेरी जो भी हालत है
ख़त में वो इबारत है
आज का जो ये ख़त है
ख़त नहीं वसिय्यत है
ऐ हबीब इस ख़त को
आख़िरी वसिय्यत को
इल्तिजा है पढ़ लेना
और जवाब लिख देना
ख़त पे नाम लिखता हूँ
फिर सलाम लिखता हूँ
ख़त की इब्तिदा यूँ हैं
लफ़्ज़ ग़म-ज़दा यूँ हैं
कर्ब है अँधेरा है
रंज-ओ-ग़म ने घेरा है
चार सू क़यामत है
ज़िंदगी अज़िय्यत है
दिल पे दाग़-ए-फ़ुर्क़त है
मेरी ख़स्ता हालत है
दर्द-ए-दिल इज़ाफ़ी है
जाँ निकलनी बाक़ी है
आ कभी अयादत को
देख मेरी हालत को
जब से तुम से बिछड़ा हूँ
ख़ुद से रूठा रहता हूँ
करवटे बदलता हूँ
मुँह से ख़ूँ उगलता हूँ
तुझ को याद करता हूँ
रोज़ जीता मरता हूँ
साँस लेना मुश्किल है
ज़ख़्म की ग़िज़ा दिल है
हाल पर तरस खाकर
तू गले लगा आ कर
दर्द की दवा दे दे
अब मुझे शिफ़ा दे दे















