बसर यूँँ ज़िंदगानी हो रही है
हर इक पल मय परस्ती हो रही है
मैं उसकी सम्त देखे जा रहा हूँ
वो लड़की मुझ पे वारी हो रही है
तेरे वादों को तुझको याद करके
मुसलसल अश्क-बारी हो रही है
हमारा हिज्र उसको भा रहा है
वो पहले से भी प्यारी हो रही है
दहकता है मुनाफिक़ का कलेजा
हमारी अग्द-ख़्वानी हो रही है
चलो आकर मुझे पहनाओ कंगन
मेरी सूनी कलाई हो रही है
उन्हें मरकर दिखाना पड़ रहा है
तो साबित बेगुनाही हो रही है
मेरी नज़रें हैं इक चेहरे के ऊपर
नए ढंग से पढ़ाई हो रही है
तुम इक लब चूम के जो जा रहे हो
मोहब्बत में उधारी हो रही है
'शजर' ये सोच के हैराँ है हरदम
क्यूँ मुझसे बे-वफ़ाई हो रही है
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