महफ़िल में था ये फ़िक़रा लबों पर जनाब के
वाइज़ मुरीद हैं तेरे हुस्न-ओ-शबाब के
बेहतर है ख़ुद को नींद से बेदार कर लो तुम
आँखों से उठ न पाएँगे ये लाशे ख़्वाब के
तारीख़-ए-करबला का ये मंज़र अजीब है
तिश्ना-लबी सुलगती है सीने में आब के
दिल फट रहा था ख़ौफ़ से ज़ालिम का देखकर
जब नारे हम लगाने लगे इंक़िलाब के
इक बा वफ़ा ये सदमा लिए दिल पे मर गया
हैं सब अधूरे बाब वफ़ा की किताब के
कर देंगे ख़ार हाथों को ज़ख़्मी शजर मियाँ
गुलशन में गर क़रीब गए तुम गुलाब के
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